छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग के बैगा जनजाति में सांस्कृतिक परिवर्तन
सचिन कुमार1, डॉ. घनश्याम दुबे2
1शोधार्थी, इतिहास विभाग, गुरु घासीदास विष्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.)
2सह प्राध्यापक, इतिहास विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail: thegrtsachin@gmail.com
ABSTRACT:
छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजातियों मे से एक बैगा जनजाति बिलासपुर संभाग मे बहुतायत संख्या मे निवासरत हैं। इस जनजाति की अपनी एक विशिष्ट सामाजिक सांस्कृतिक विरासत पीढ़ियों से चली आ रही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी विशेष मान्यताओं, परंपराओं का प्रचलन है किन्तु आधुनिकता एवं बाह्य समाज से संबंध होने एवं एकाकी जीवन तथा जंगलों से पूर्ण निर्भरता कम होने के कारण इस जनजाति मे सांस्कृतिक परिवर्तन होने लगे हैं। प्रसव गाँव की दाई के अलावा अब अस्पतालों मे होने लगे हैं। विवाह परम्पराओं में सिंदूर का प्रचलन प्रारम्भ हो गया है। रोगों के ईलाज के लिए अब परंपरागत प्रक्रिया के अलावा चिकित्सकों अथवा दवाखानों का रुख करने लगे हैं। बैगा जनजाति मे सर्वाधिक महत्व रखने वाली परंपरा “गोदना“ की मूलता का अस्तित्व छिन्न-भिन्न हो गया है। मुख्य धारा मे जुड़ने की राह मे इस जनजाति की मूल संस्कृति मे आमूलचुल परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगी है।
KEYWORDS: जनजाति, बैगा, संस्कृति, परम्परा, परिवर्तन, गोदना, आधुनिकता, बाह्य समाज
INTRODUCTION:
भारत के ह्रदय स्थल में 135194 किलोमीटर2 क्षेत्र में बसा छत्तीसगढ़ अपनी जनजातीय विशिष्टतों के लिए जाना जाता है। यहाँ 43 प्रकार के प्रमुख जनजातियाँ पायी जाती है। जिनमें से पांच जनजातियाँ केंद्र द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति (अबूझमाड़िया, बैगा, बिरहोर, कमार, तथा पहाड़ी कोरवा) के रूप में तथा दो छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति (भुंजिया और पंडो) के रूप में घोषित है। इन जनजातियों की विशिष्ट परम्परा, मान्यताएं, रीति-रिवाज इत्यादि अपनी विलक्षण प्रकृति के साथ चले आ रहे हैं परन्तु वर्तमान में आधुनिक युग के संपर्क तथा अन्य दुसरे समाज के साथ संपर्क स्थापित होने के कारण इनकी सांस्कृतिक पद्धतियों में नवीन परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग में निवासरत बैगा जनजाति में भी सांस्कृतिक परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है। पूजा पद्धति, विवाह संस्कार, मृत्यु संस्कार तथा अन्य सामाजिक पहलुओं पर हमें उनकी मूलता में काफी परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं।
बैगा जनजाति का सामान्य परिचय
छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजातियों में सर्वाधिक जनसँख्या बैगा जनजाति का है। विशेष रूप से बैगा जनजाति के बारे में अंग्रेज अध्येताओं ने कार्य कियाए उनके ग्रंथों से बैगा जनजाति के बारे में जीवंत जानकारी प्राप्त होती है। वर्तमान में इस जनजाति के स्वरूप में परिवर्तन दिखाई देता है। क्योंकि आधुनिक सभ्यता के संपर्क में आने से वे अपने प्राचीन स्वरूप से अलग दिखाई पड़ते है। साथ ही वे आदिम परम्पराओं से काफी हट गये है और उन क्षेत्रों में विद्यमान संस्कृतियों को अपना लिया है किन्तु यह जनजाति अत्यंत ही प्राचीन जनजाति है। इस जनजाति के बारे में ऐतिहासिक जानकारी का अभाव है, किन्तु समय-समय पर अध्ययनकर्ताओं ने बैगा जनजाति के सन्दर्भ में अध्ययन किया है। इसमे सर्वप्रथम 1867 ई. में कैप्टन थामसन ने बैगा जनजाति के बारे में लिखा है कि बैगा जनजाति बहुत ही पिछड़ी अवस्था में है और सभ्य मनुष्य के संपर्क में आने से डरते है। थामसन के पश्चात ब्लूम फील्ड जो अगस्त 1868 ई. से अक्टूबर 1869 ई. के बीच बालाघाट के डिप्टी कमिश्नर थे। उन्होने अपनी पुस्तक नोट्स आन द बैगाश् में बैगा जनजाति के संबंध में निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है
1 वृक्षों को काट कर बेवर कृषि करते हैं।
2 शिकार और मछली पकड़ते हैं।
3 जंगली जड़ी और फलों का संग्रह करते हैं।
4 दूसरों के घर मजदूरी करते हैं।
5 शहद और हर्रा जैसे वनोपजों को इकट्ठा कर बेचते हैं।
6 बांस की चटाई और टोकरी बनाते और बेचते हैं।
7 गाँव में ओझा का कार्य करते हैए झाड़.फूंक और जंगली जड़ी.बूटियों से रोगोपचार करते हैं।
ब्लूम फील्ड ने सर्वप्रथम बैगा जनजाति के बारे में उनके निवास क्षेत्र तथा लक्षण के बारे में जानकारी दिया है। जे. डब्लू. चिज़म के रिपोर्ट आन द लैण्ड रेवेन्यु सेटलमेंट आफ द बिलासपुर डिस्ट्रिक्टएइन सेन्ट्रल प्रोविजन 1868 ई. में बैगाओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इस रिपोर्ट में बैगा को भूमिया के निकट बताया गया है। चिज़म के रिपोर्ट में बैगा के रोगोपचार के ज्ञान के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। इसी प्रकार जे. एफ. के. हेविट के रिपोर्ट आन द लैण्ड रेवेन्यु सेटलमेंट आफ द रायपुर डिस्ट्रिक्ट इन सेन्ट्रल प्रोविजन 1869 ई में बैगाओं को बिंझवार से संबंधित बताया गया है। हेविट ने बैगाओं का निवास क्षेत्र मंडला के आसपास के क्षेत्र को बताया है। इसी समय कर्नल वार्ड की मंडला सेटलमेंट रिपोर्ट 1870 ई. से जानकारी मिलती है कि ये जनजाति जंगली अवस्था में रहते है और अपने समूह के साथ स्वतंत्र रूप से रहना पसंद करते है। सन 1872 ई. में कैप्टन जे. फोरसिथ द्वारा लिखित पुस्तक द हाइलैंड आफ सेन्ट्रल इंडियाश् में बैगा जनजाति के बारे में उल्लेख किया गया है कि ये जनजाति दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रां में निवास करते है। इस जनजाति के पुरुष केवल एक लम्बा लंगोट धारण करते है। इनके केश कोयले की तरह काले होते है। इनके कंधे पर तीर.कमान व कुल्हाड़ी टंगे होते है। सन 1916 ई. में प्रकाशित द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द सेन्ट्रल प्रोविजन ऑफ इंडियाश् में रसेल एवं हीरालाल ने बैगा जनजाति के बारे में काफी वर्णन किया है। इनके अनुसार बैगा आदिम द्रविड़ समूह की जनजाति है। जो मध्य भारत के मंडला, बालाघाट एवं बिलासपुर जिलों के सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं में निवास करती है तथा इनके निवास स्थान ऊंचे तथा घने जंगलों में होते है, जहाँ पहुँचने के लिए एक मात्र पगडण्डी दिखाई देती है। इस कारण से ये कभी.कभी दिखाई देते है जब उन्हें बनिए से या मदिरा विक्रेता से काम होता है। सन 1931 ई में डब्ल्यू. एच. शूबर्ट ने सुपरिटेंडेंट ऑफ सेन्सस ऑपरेशन सेन्ट्रल प्रोविजन एंड बरार में बैगा जनजाति के संबंध में उल्लेख किया है कि बैगा अब केवल लंगोट न पहनकर कुछ कपड़ों का भी प्रयोग करने लगे है और धीरे.धीरे इनके जीवन शैली में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। सन 1939 ई. में वेरियर एल्विन की पुस्तक द बैगाश् में बैगा जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। इस पुस्तक में बैगा जनजाति के जीवन से संबंधित प्रत्येक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार बैगा जनजाति आदिम जनजाति है और यह जनजाति एकांत जीवन निर्वाह करना पसंद करती है। इसी प्रकार बैगा जनजाति के आर्थिक पहलुओं का विवरण डी. एस. नाग ने सन 1958 ई. में प्रकाशित अपनी पुस्तक ट्राइबल इकोनामी:ए स्टडी ऑफ द बैगाश् में किया है।
बैगा जनजाति का छत्तीसगढ़ में भौगोलिक प्रसार
बैगा निवास एवं जनसँख्या की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का स्थान दूसरा है। छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से कबीरधाम जिले के पंडरिया तथा बोडला विकासखंड में, कोरिया जिले के मनेन्द्रगढ़, खड़गवा तथा भरतपुर विकासखंड में, बिलासपुर जिले के गौरेला, तखतपुर तथा कोटा विकासखंड में, मुंगेली जिला के लोरमी विकासखंड में तथा राजनांदगांव जिला के छुईखदान विकासखंड में निवास करते है। 2011 ई. के जनसँख्या के अनुसार छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग में बैगा जनजाति की जनसँख्या इस तालिका में है।
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बैगा जनजाति का समाज एवं संस्कृति
बैगा जनजाति कई अन्तः विवाही उपजातियों में विभक्त है। इनमें प्रमुख उपजाति बिंझवार, भारोटिया, नरोटिया, रामभैना, दूध मैना, कोडवान, गोंडमैना, कुरका बैगा, सावत बैगा इत्यादि है। उपजातियाँ विभिन्न बहिर्विवाही गोत्र में विभक्त है। इनके प्रमुख गोत्र मरावी, धुर्वे, मरकाम, परतेती, टेकाम, नेताम आदि है। प्रत्येक गोत्र में टोटम पाए जाते हैं। यह जनजाति पितृवंशीय, पितृसत्तात्मक तथा पितृनिवास स्थानीय होते हैं।
जीवन चक्र के दृष्टि कोण से“ प्रसव घर में ही स्थानीय सुनमाई’(दाई) तथा परिवार के बुजुर्ग महिलाएं कराती हैं। प्रसूता को सोंठ, पीपल, अजवायन, गुड़ आदि का लड्डू बनाकर खिलते हैं। छठें दिन छट्ठी मनाते हैं। प्रसूता और नवजात शिशु को नहलाकर कुल देवी-देवता को प्रणाम कराते हैं। घर की साफ़ सफाई तथा रिश्तेदारों को शराब पिलाते हैं।
विवाह उम्र लड़कों का 16-18 वर्ष तथा लड़कियों की 14 से 16 वर्ष माना जाता है। विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है। मामा, बुआ के लड़के-लड़कियों के बीच आपस में विवाह होता है। वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को ’खर्ची’ (वधूधन)के रूप में चावल, दाल, हल्दी, तेल, गुड़ व कुछ नगद रकम दिया जाता है। विवाह की रस्म बैगा बुजुर्गों के देखरेख में संपन्न होता है। ’लमसेना’ (सेवा विवाह) सहपलायन विवाह ’पैढू विवाह’ (घुसपैठ), ’गुरावट’ (विनिमय) विवाह को समाज स्वीकृति प्रदान करता है। पुनर्विवाह ’खडोनी’ भी प्रचलित है। मृत्यु होने पर मृतक को दफनाया जाता है। तीसरे दिन घर व कपड़ों की साफ-सफाई करते हैं। पुरुष दाढ़ी- मूंछ सिर के बाल कटाते हैं। दसवे दिन दशकर्म करते हैं और भोज देते हैं।
धार्मिक जीवन के अंतर्गत इनके प्रमुख देवी-देवता बूढ़ादेव, ठाकुर देव, नारायण देव, भीमसेन देव, घनश्याम देव, धरती माता, ठाकुराईन माई, खैर माई,रात माई, बूढ़ी माई, दूल्हा देव आदि हैं। इनके पूजा में मुर्गा,बकरा, सूअर की बलि देते हैं। कभी-कभी नारियल वह दारू से ही पूजा संपन्न कर लिया जाता है। इनके प्रमुख त्योहार हरेली, पोला, नवाखाई, दशहरा, काली चौदस, दिवाली, करमा पूजा, होली आदि हैं। जादू-टोना, मंत्र-तंत्र, भूत-प्रेत में भी काफी विश्वास करते हैं। ’भूमका’ इनके देवी देवता का पुजारी व भूत प्रेत भगाने वाला होता है।
इनके प्रमुख लोक कलाओं में लोक नृत्य करमा, विवाह में बिलमा नाच, दशहरा में झटपट आदि हैं। छेरता इनकी नृत्य नाटिका है। इनके प्रमुख लोकगीत करमा गीत, ददरिया, सुआ गीत, विवाह गीत, माता सेवा, फाग आदि हैं।
बैगा जनजाति का सांस्कृतिक परिवर्तन
बैगा जनजाति समाज में विभिन्न तरह के सांस्कृतिक परिवर्तन दिखने लगे है वर्तमान परिवेश में पुराने रीति रिवाजों के साथ तालमेल बिठा के नवीन परिवर्तन भी आवश्यक है। ये जनजाति आधुनिकता के दौर में अब जंगलों से निकल के अन्य समाज के साथ नवीन मानवीय सम्बन्ध स्थापित कर रहा है और अन्य समाज के रीति रिवाज से प्रभावित हो रहे हैं। बिलासपुर संभाग के विभिन्न गाँव में किये गए साक्षात्कार एवं प्रश्नावली से निम्नलिखित तथ्य सामने आये हैं -
जन्म संस्कार
बैगा जनजाति में यदि जन्म के सम्बन्ध में प्रथा थी कि ससुराल में ही घर में ही किसी दाई से अथवा किसी बुजुर्ग महिला से ही प्रसव कराया जाता था। अब अल्प मात्र में ही सही परन्तु प्रसव हेतु अस्पताल का रुख भी किया जाने लगा है, साथ ही बच्चे के जन्म के पश्चात जो घरेलु उपाय, दवा बूटी, टोना टोटका इत्यादि करते थे वह भी अब कम होने लगे है परन्तु इस परिवर्तन के बावजूद जन्म सम्बन्धी संस्कार छठी अपने पुराने परम्परा अनुरूप ही मनाते हैं।
विवाह संस्कार
विवाह संस्कार में बैगा जनजाति में विभिन्न तरह के विवाहों का प्रचलन है जिनमें प्रमुख है ढुकू विवाह, गोलत विवाह, खडोंनी विवाह और चूड़ी पहनाना आदि, परन्तु आधुनिकता के संपर्क में वैवाहिक रिवाजों में भी अल्प परिवर्तन देखने को मिलता है, अब बाल विवाह में कमी आई है। लड़की की पसंद का भी ध्यान रखा जाता है। दहेज़ प्रथा अब और अधिक हो गयी है यद्यपि दहेज़ प्रताड़ना कम ही है। अन्तर्जातीय विवाह करने पे समाज में स्थान नहीं दिया जाता। जाति पंचायत के माध्यम से उन्हें समाज से बेदखल कर दिया जाता है। स्वयं के जाति में प्रचलित प्रथाओं के विपरीत यदि विवाह कर लिया जाता है तो सामान्य दंड यथा आर्थिक, बलि और महुआ पानी से निपटारा कर लिया जाता है। महिलायें सिंदूर नहीं लगाती परन्त अन्य समाज के प्रभाव में अब विवाहित महिलाएं सिंदूर का भी उपयोग करने लगीं हैं। इसके साथ ही जनजाति महिलाओं में नाक में छेद नहीं करवाती थी पर अब करवाने लगीं हैं।
मृत्यु संस्कार
मृत्यु संस्कार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिखाई देता पर परम्परा अनुरूप पहले मृतक की उपयोग की चीज भी मृतक के परलौकिक जीवन के लिए छोड़ देते थे चाहे वह कीमती ही क्यों न हो पर अब ऐसा कम ही होता है।
विभिन्न त्यौहार
त्योहारों की दृष्टिकोण से ये जनजाति अपनी विभिन्न पारम्परिक त्यौहार जैसे करमा, नवाखाई, दीवाली, होली आदि आज भी उन्हीं परम्परागत तरीके से मनाती है, परन्तु अब और भी त्यौहार जो अन्य समाज में अधिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है उसको भी अपनाने लगे हैं, जैसे़-तीजा, पोरा, रक्षाबंधन, भाईदूज, गणेश चतुर्थी, नवरात्री इत्यादि। दिवाली में परंपरागत रूप से केवल अपने कुल देवताओं की पूजा अर्चना की जाती थी, पर अब लक्ष्मी पूजा भी की जाती है।
गोदना संस्कार
गोदना परम्परा जो बैगा जनजातियों में प्रसिद्ध है अब बहुत ही कम हो गया है। यह परम्परा महिलाओं पे अधिक प्रचलित थी वह अब कम हो गया है। अब महिलाओं की जगह पुरुष इन्हें अधिक उपयोग करते है। पारंपरिक गोदना चित्र अब आधुनिक टैटू का रूप ले चूका है।
निष्कर्ष:-
निष्कर्ष के रूप में देखते हैं कि जनजातियाँ अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत के कारण जानी जाती हैं। बैगा जनजाति भी इसी तरह ही विशिष्ट सांस्कृतिक विरासतों को समेटे हुए हैं, किन्तु “परिवर्तन”विकासशील मानव का एक अभिन्न गुण है तथा प्रभावी कारकों के कारण मानवीय परिवर्तन से समाज भी परिवर्तित होते रहता है। आधुनिक समाज, मुख्य धारा में लाने हेतु किये गए प्रयास एवं अन्य समाज के कारण इनके विभिन्न रीति रिवाज एवं परम्पराओं में परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं। अब ये केवल जंगलों तक सीमित नहीं है अपितु बाह्य समाज से व्यापक संपर्क स्थापित कर रहा है। वैद्य, टोना टोटका, जड़ी बूटियों तक सीमित न होकर अब मुख्य धारा के साथ आने लगे हैं। विभिन्न पहलुओं में शनैः शनैः परिवर्तन होने लगे है। यह कहना अत्यंत कठिन है कि यह परिवर्तन ठीक है या नहीं, यदि परिवर्तन नहीं होगा तो वे मुख्य धारा से जुड़ नहीं पायेंगे और जंगलों तक ही सीमित रह जायेंगे और यदि परिवर्तन हो तब इनकी सांस्कृतिक विरासत नष्ट होने लगेगी। हमें चाहिए कि इनकी सांस्कृतिक विरासत को भी अक्षुण्ण रखते हुए मुख्य धारा में समाहित किये जाने हेतु प्रयास करना अधिक उचित होगा।
संदर्भ गं्रथ:-
1. छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर राज्यपाल का प्रतिवेदन, छत्तीसगढ़ शासन आदिमजाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग, नया रायपुर, छत्तीसगढ़, 2012-13,
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3. सिन्हा, अनिल कुमार, छत्तीसगढ की आदिम जनजातियाँ, नार्दन बुक संेटर, नई दिल्ली, 2006,
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7. उपाध्याय, डॉ. विजय शंकर, शर्मा, डॉ. विजय प्रकाशः भारत की जनजातीय संस्कृति, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, 1989
8. वैष्णव, टी, के.ः छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजातियाँ, छत्तीसगढ़ आदिम जाति अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण संस्थान, रायपुर, 2004
9. ग्राम बहेरामुड़ा तहसील कोटा के सरिता बैगा पति मिथलेश बैगा से प्राप्त जानकारी के अनुसार
10. ग्राम बहेरामुड़ा तहसील कोटा के सूकवारा बैगा पति सुशील बैगा से प्राप्त जानकारी के अनुसार
11. ग्राम बहेरामुड़ा तहसील कोटा के सुकरिया बैगा पिता सियाराम बैगा से प्राप्त जानकारी के अनुसार
12. ग्राम उमरिया तहसील कोटा के चैती बाई पति घासीराम से प्राप्त जानकारी के अनुसार
13. ग्राम उमरिया तहसील कोटा के मन कुँवर पति स्व॰ सुरेश से प्राप्त जानकारी के अनुसार
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Received on 31.10.2023 Modified on 10.11.2023 Accepted on 30.11.2023 © A&V Publication all right reserved Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(4):265-269. DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00045 |